शुभाशंसा | Endorsements

[2018] अमृत की कविता में प्रकृति और परिवेश के असंख्य बिम्ब हैं, असंख्य कथन हैं और उनके पीछे एक तरह का भय झांकता दिखाई देता है उनके पीछे से। अमृत की कविताओं में यही नयापन है जो मुझे आकर्षित करता है और एक बेहतर कवि की सम्भावना जगाता है। परम्परागत रूप से जिसे सौन्दर्य कहा जाता रहा है, जिन उपादानों को प्रकृति के आलंबन के रूप में देखा जाता रहा है अमृत की कविताओं में उनको लेकर एक तरह का संशय है, एक तरह का भय है, सिहरन है, प्रश्नाकुलता है। यह काव्य-मुहावरा नितांत मौलिक है जो अमृत की कविताओं में दिखाई देता है। जो है उससे परे जाकर देखने वाली उसकी नजर हिंदी कविता की कुछ बेहतर निगाहों में हैं। एक बेहतर सम्भावना। more…

प्रभात रंजन, असोसियेट प्रोफ़ेसर, कथाकार, प्रधान संपादक, जानकीपुल

[2019] पन्द्रह/सोलह साल के इस कवि की कविताओं को पढ़ती हूँ एक सुंदर अनुभूति से मन झंकृत हो जाता है. कितनी कम उम्र और विचारों में कितनी गहनता…सोचते-सोचते तमाम वे क्लासिक रचयिता ज़हन में कौंध उठते हैं, जिन्होंने युवता छूते-छूते रचनात्मकता की पराकाष्ठा को भी छू लिया था. हमारा यह किशोर कवि भी लगभग उसी चाक पर ढला है. स्वरूप तो इसने ख़ूब सुंदर पा लिया, अब पकना है अनुभव की आँच पर. more…

अणु शक्ति सिंह, लेखिका-पत्रकार

[2019] अठारह साल से कम उम्र क अमृत रंजन (जन्म 2002) का काव्य संग्रह “जहां नहीं गया” एक सचेत मतदाता के बनने की प्रक्रिया का रचनात्मक दस्तावेज है. इस प्रक्रिया में किताब के पहले पन्ने से लेकर आखिर-आखिर तक उनके हाथ में भारत का प्राकृतिक नक्शा मौजूद रहता है और वो अपने जीवन अनुभूतियों, स्मृतियों और परिवेशगत यथार्थ का जिक्र करने के क्रम में न केवल इस नक्शे को ऑक्सीजन की तरह अपने साथ रखते हैं बल्कि गहरे उतरने पर कविताओं में यह नक्शा भावों के उतार-चढ़ाव के साथ एक स्थायी चिंता के तौर पर नजर आता है. इस देश का राजनीतिक नक्शा साथ रखकर लिखने के साथ एक सुविधा फिर भी रहती है कि हम तमाम तरह की विसंगतियों के लिए, अमानवीय स्थितियों और बदतर होते जाते माहौल के लिए आखिर तक आते-आते किसी एक राजनीतिक दल, विचारधारा, समुदाय के लोगों को जिम्मेदार ठहरा दें. जिम्मेदार न भी ठहरा सकें तो भारतीय संविधान की तरफ उम्मीद की निगाहों से देखने लग जाएं लेकिन अमृत जिस प्राकृतिक नक्शे को लेकर अपनी बात करते हैं, उसमें यह सुविधा नहीं रह जाती. वो एकदम परिणति की मुद्रा में लिखते हैं. more…

विनीत कुमार, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय, मीडिया क्रीटिक

[2019] शब्द जो सजग हैं संलिप्त भी हमारे क्रियाकलापों को लेकर । शब्द जो परत दर परत पड़ताल कर रहे हैं हमारे आसपास की विद्रूपताओं का । इस भयावह वक्त में जब हम उन्हीं सड़कों पर चल रहे हैं , जिसके नीचे की मिट्टी रोज़ धंसी जा रही है , अमृत रंजन वह सुदृढ़ नींव बनकर उभरे हैं जो न सिर्फ़ अपनी प्रगतिशील पीढ़ी की का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं , बल्कि हमारी साहित्यक क्षरण के विरुद्ध एक मज़बूत बौद्धिक दीवार बन कर भी खड़े हुए हैं । उन्हें बखूबी ज्ञात है कि अपनी विरासत को सहेजना और उसे समृद्ध बनाना क्या होता है। आज अमृत की क़लम से निकले शब्द कुम्हार की चाक पर गढ़े जा रहे टेढ़े मेढ़े चुक्का सरीखे भले ही हों , आने वाले दिनों में उनकी ठनक देर तक और बहुत दूर तक सुनाई देगी। more…

स्मिता सिन्हा, कवयित्री

[2019] अमृत की यह किताब कविताओं की दुनिया की सैर कराती है। कविता संग्रह का नाम है- ‘जहाँ नहीं गया’. एक बनते हुए कवि की यह किताब अनवरत कोशिश का शानदार उदाहरण है। हम जैसे खेती-बाड़ी करने वाले लोग अनवरत कोशिश का अर्थ सबसे अधिक समझते हैं लेकिन अमृत की कविताओं को पढ़ते हुए अहसास हुआ कि शब्दों की यात्रा में भी अनवरत कोशिश का फल बहुत ही मीठा होता है। अमृत को पढ़ते हुए लगा कि उसे पता है कि शब्द को किस तरह से गढ़ना है कि पंक्ति- बद्ध शब्द ऑर्गेनिक लगे। यह कला है, जिसमें अमृत बढियां से काम कर रहे हैं। एक-एक शब्द कहाँ से कैसी ध्वनि देगी, मानो उसे यह सब पता हो। more…

गिरीन्द्रनाथ झा, लेखक व किसान

[2019] कच्चे मन की परिपक्व अभिव्यक्ति और सब कुछ को अलग ढंग से देखने- कहने के कारण और इस कारण भी कि एग्ज़िसटेंशियल यातना को किशोर दृष्टि से आँका गया है। नए समय के मन के संघर्षों को, उगते संशयों और प्रश्नों को शब्द देने की शुरुआत करने के लिए अमृत की पीठ थपकना ज़रूरी है, लेकिन सावधानी से कि कहीं उसके हाथ से क़लम न छूट जाए। more…

अनुकृति उपाध्याय, लेखिका

[2011] अमृत के बहाने ही मैं जान सका कि बच्चे भी ब्लॉग का इस्तेमाल कर सकते हैं, वो भी अलग ढंग से। आज जब नजर गई तो इसे मैंने अपने फेवेरिट लिंक में जोड़ भी दिया, इस तरह अमृत मेरे आभासी दोस्त बन गए हैं। एक ऐसा दोस्त जिससे मुलाकात नहीं हुई है, जिसके बारे में कुछ नहीं पता है, पता है तो बस यही कि वह कम्पूटर पर हिंदी में लिखता है….। more…

गिरीन्द्रनाथ झा, लेखक व किसान

[2011] ब्लॉग ‘आम का पेड़’ की राष्ट्रीय अख़बार के कॉलम में चर्चा